भारत रत्न और काशी हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) के संस्थापक मदन मोहन मालवीय पर विवादित टिप्पणी के मामले में कुलपति प्रोफेसर राकेश भटनागर ने खेद जताया है। इसका ऑडियो वायरल होने के बाद छात्रों ने गुरुवार को कुलपति के खिलाफ प्रदर्शन किया। इसके बाद बैकफुट पर आए कुलपति ने छात्रों की चली आ रही ओपीडी शुल्क फ्री वाली मांग को मान लिया है। अब विश्वविद्यालय के छात्रों को ओपीडी रजिस्ट्रेशन शुल्क नहीं देना होगा।
अब कुलपति ने क्या कहा?
कुलपति प्रो राकेश भटनागर ने कहा कि, महामना पंडित मदन मोहन मालवीय जी द्वारा स्थापित काशी हिंदू विश्वविद्यालय मेरी कर्मभूमि है, जिसकी सेवा करने के लिए मैं पूरी ईमानदारी और कर्तव्यनिष्ठा के साथ कार्य कर रहा हूं। महामना मालवीय जी मेरे प्रेरणास्रोत हैं और मैं उनके आदर्शों और मूल्यों का पालन करता हूं। महामना जी के प्रति मैं पूर्ण निष्ठा एवं सम्मान रखता हूं। वे न केवल हम सब के लिए पूज्यनीय हैं, बल्कि हम सभी के लिए मार्गदर्शन का स्रोत भी हैं और उनकी अवमानना का विचार भी किसी के मन में नहीं आ सकता। महामना के बारे में मेरे कथन से किसी को गलतफहमी हुई हो और उससे उनकी भावना आहत हुई है तो यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण व पीड़ादायक है। जहां तक छात्रों के लिए निशुल्क स्वास्थ्य सुविधा की बात है उसे स्वीकार करते हुए विश्वविद्यालय द्वारा छात्रों के लिए ओपीडी ओपेन रजिस्ट्रेशन को निशुल्क कर दिया गया है। इससे जानकारी शीघ्र ही वेबसाइट पर जारी कर दी जाएगी।
ओपीडी शुल्क का विरोध कर रहे छात्र
दरअसल, बीएचयू के छात्र यहां सर सुंदर लाल चिकित्सालय में ओपीडी शुल्क वसूली का विरोध कर रहे हैं। पहले छात्रों को फ्री हेल्थ और जांच की सुविधा मिलती थी। कोरोना महामारी में लॉकडाउन के बाद से विश्वविद्यालय प्रशासन ने छात्रों को दी जाने वाली इस सुविधा पर रोक लगा दी है। अब ओपीडी में परामर्श के लिए 20 रुपए की पर्ची कटवानी पड़ रही है। इसका विरोध कर रहे हैं।
पहले छात्र से बातचीत में कुलपति ने यह कहा था
ओपीडी शुल्क माफ करने के बाबत किसी छात्र से कुलपति प्रोफेसर भटनागर की बात हो रही थी। कुलपति ने कहा ‘महामनाजी आम के पेड़ तो लगा गए, अगर मेरे लिए कुछ रुपए के पेड़ लगा जाते तो हम सब कुछ फ्री कर देते।’ यूजीसी 60 करोड़ रुपए देती है और 66 करोड़ रुपए बिजली का बिल आ जाता है। घाटे की अर्थ व्यवस्था है। यह कांग्रेस की बनाई व्यवस्था है। 350 रुपए बच्चों से स्वास्थ के नाम पर लिया जाता है। पर्ची अब छात्रों को कटवाना पड़ रहा है। अस्पताल बंद न हो, इसलिए छात्रों से चार्ज लिया जा रहा है। हमारे लिए बहुत बड़ी मजबूरी है। मैं भी पैसा देकर ही दिखाता हूं। 500 रुपया महीना मेरे तनख्वाह से कटता है।
बातचीत में छात्र ने कहा कि ये 33 हजार छात्रों का मामला है। तब वीसी ने कहा कि सरकार से कहो 70 करोड़ की राशि हमें दी जाए। कोविड में टैक्स बढ़े हैं। मेरे इस्तीफा देने से व्यवस्था नहीं बदल सकती है। अस्पताल में बिजली का खर्च सबसे ज्यादा है। जेएनयू में चौथाई बच्चे पढ़ते हैं। वहां भी किसी तरह काम चल जा रहा है। जेएनयू में खूब फीस बढ़ रही है। चिंता मत कीजिए।
कांग्रेस ने किया ट्वीट
इस मामले में यूपी कांग्रेस ने ट्वीट कर लिखा- अत्यंत शर्मनाक कृत्य। आरएसएस प्रायोजित बीएचयू के वाइस चांसलर राकेश भटनागरजी के बयान से बीजेपी-आरएसएस की मानसिकता देश के सामने आ ही गई। अब इनको भारत रत्न महामना पंडित मदन मोहन मालवीयजी के द्वारा पैसों का पेड़ भी चाहिए।
विवादों से रहा कुलपति का नाता, हिंदी विरोधी होने का आरोप भी लगा
- बीएचयू के वीसी भटनागर मार्च 2018 में आए थे। जेएनयू से आने पर कई तरह के आरोप लगे। किसी ने आरएसएस तो किसी ने कांग्रेस का बताया। सबसे बड़ा विवाद संस्कृत विद्या धर्म संकाय में फिरोज खान की नियुक्ति को लेकर हुआ। 34 दिनों तक छात्रों ने धरना प्रदर्शन किया। बाद में फिरोज की नियुक्ति कला संकाय के संस्कृत विभाग में कर दी गई।
- जनवरी 2019 में नियुक्तियों के दौरान अभ्यर्थियों ने हिंदी में इंटरव्यू में जबाब दिया, तो उन्हें बाहर कर दिया गया था। इसको लेकर कई दिनों तक विवाद चला।
- इसी मुद्दे को लेकर 27 फरवरी को अंतरराष्ट्रीय पुरातन छात्र सम्मेलन में वीसी का स्वतंत्रता भवन में जमकर विरोध हुआ था।
- इसी मुद्दे को लेकर केंद्रीय मंत्री रमेश पोखरियाल के सामने भी जमकर विरोध प्रदर्शन हुए थे।
- हिंदी विरोधी होने का आरोप लगा। काफी दिनों तक पोस्टर बैनर कैम्पस के साथ शहर में भी लगा।
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